टैक्स है, लेकिन सुविधाएं नहीं – जनता का सवाल

आज भारत में करों का बोझ दिन-ब-दिन बढ़ रहा है, लेकिन सुविधाओं का स्तर ज्यों का त्यों है। चाहे सड़क हो, अस्पताल हों, या सार्वजनिक परिवहन — हम टैक्स चुका रहे हैं, पर इनसे मिलने वाली आम जनता को राहत नहीं मिल रही।

​ 1. टैक्स की भूख: हर साल रिकॉर्ड कलेक्शन

 • केंद्रीय बजट बिजनेस इकोनॉमिक्स के अनुसार, वर्ष 2024-25 के लिए सकल कर राजस्व (Gross Tax Revenue) ₹38.40 लाख करोड़ (≈11.8% GDP) का अनुमान था, जिससे केंद्र को नेट लगभग ₹25.83 लाख करोड़ प्राप्त होंगे   ।

 • वहीं, आयकर और कॉर्पोरेट कर में भी बढ़त देखी गई है—आयकर में 13.6%, एसटी और जीएसटी में 11% तक वृद्धि   ।

 • केंद्र और राज्यों को हर वर्ष ट्रिलियन्स रूपए टैक्स के रूप में मिलते हैं, लेकिन इसका प्रत्युत्तर जनता के लिए व्यापक सुविधाएं हो, वह नहीं दिखता।

​ 2. सड़कें बनीं हैं खर्च का काला कुआँ

 • पुणे नगर निगम ने बताया कि उन्होंने 11,000 टन सामग्री से 1.5 लाख वर्ग फुट सड़क मरम्मत किया है, मगर अभी भी खराब सड़कें और गड्ढों की शिकायतें आम हैं  ।

 • अहमदाबाद में चार वर्षों में ₹4,670 करोड़ सड़क निर्माण पर खर्च हुए, लेकिन 19,000 गड्ढे और कई “cave-ins” रिपोर्ट हुए; ₹2,000 करोड़ का ऑडिट नहीं हुआ—पारदर्शिता की कमी साफ है  ।

 • नई दिल्ली में भी नागपुर और लखनऊ जैसी जगहों पर तेज बारिश के बाद सड़कें तुरन्त टूट रही हैं, जिससे आवागमन प्रभावित हुआ  ।

 • संसद की सार्वजनिक लेखा समिति (PAC) ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर “perpetual tolling” और अधूरे एवम् घटिया निर्माणों पर आरोप लगाया, और कहा है कि यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर ठीक न हो तो टोल रद्द होना चाहिए  ।

​ 3. जनता की आवाज़: “करो हमसे, सुविधा हमें नहीं”

 • बेंगलुरु की एक डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर कहा:

“Highest road tax, yet highest suffering”

15 किमी का सफर तीन घंटे लग गया, सड़कें खराब से बिगड़ी ऊपर, नियम पालन शून्य मिला   ।

 • नागपुऱ में 61 दिनों में 1,187 गड्ढे भरे गए, मगर लोक शिकायत है कि मरम्मत “सतही” है और बरसात में फिर से गले पड़े रहे  ।

 • नागपुऱ फलोवर की हालत इतनी खराब है कि लोग उसे “pothole maze” कह रहे हैं—खतरे के सायों के बीच स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं  ।

​ 4. योजनाओं की रिवर्स डायनमिक — सरकारी दान से गरीबों को, मध्यवर्ग को बोझ

 • सरकार अक्सर कहती है कि मध्यवर्ग के खर्च बढ़ाने से गरीबों को लाभ मिलेगा। लेकिन अक्सर महंगाई भी बढ़ जाती है, और मध्यवर्ग पर दोहरा भार बनता है।

 • बजट 2024-25 में सब्सिडी ₹3.81 लाख करोड़ थी (≈10.3% राजस्व व्यय), जो गृहयोजना, कृषि, ईंधन पर जाती है  ।

 • एक तरफ सब्सिडी मिलने से गरीबों को सुविधा मिलती है; दूसरी ओर, इसे चलाने के लिए टैक्स में वृद्धि और ब्याज भुगतान (Revenue Expenditure का लगभग 24–37%) बढ़ते हैं   ।

​ 5. विकास दिखता है या सिर्फ आंकड़ों में?

 • कुल राजस्व और टैक्स संग्रह बढ़ रहे हैं, और बजट डेफिसिट टारगेट के अंदर है (2024-25 —4.8%, 2025-26 टारगेट 4.4%)  ।

 • तरलता और पूंजीगत व्यय (Infrastructure) भी बढ़े हैं—Q1 में राजस्व संग्रह ₹3.5 ट्रिलियन, पूंजी व्यय ₹2.2 ट्रिलियन  ।

 • फिर भी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाओं की गुणवत्ता में बदलाव नहीं दिखता—यह सवाल खड़ा करता है कि क्या विकास सिर्फ संख्या में है या वास्तविक में।

भारत टैक्स में रिकॉर्ड कलेक्शन कर रहा है, लेकिन उससे मिलने वाली सुविधाओं में कमी है। सड़कें हों या सार्वजनिक सेवाएँ — खर्च बहुत है, पर परिणाम साफ नहीं। सरकारें चाहे कोई भी हो, लालचकम नहीं हो रहा, लेकिन ट्रांस्पेरेंसी और जवाबदेही बहुत कम है।

अब सवाल यह है:

 • क्या भारत वाकई विकसित हो रहा है?

 • या बस आर्थिक आंकड़ों में “विकास” दर्ज हो रहा है, जबकि आम जनता के जीवन स्तर में वास्तविक बदलाव की लताकत नहीं दिखती?