
मुंबई की एक विशेष एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) अदालत ने 2008 के मालेगांव बम धमाके मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है। इनमें प्रमुख रूप से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित शामिल हैं। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा और यूएपीए जैसे गंभीर कानूनों के तहत कार्यवाही का कोई मजबूत आधार नहीं था।
इस फैसले के बाद साध्वी प्रज्ञा कोर्ट में भावुक हो गईं। उन्होंने कहा, “मैं एक सन्यासी थी, लेकिन मुझे आतंकवादी बताया गया। 13 दिनों तक मुझे प्रताड़ित किया गया और 17 साल तक मेरी छवि खराब की गई। आज सत्य की विजय हुई है। भगवा की जीत हुई है।
”राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने फैसले के बाद कांग्रेस पार्टी पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि “कांग्रेस ने अपने वोट बैंक की राजनीति के तहत ‘हिंदू टेरर’ जैसे शब्द गढ़े, जिससे देश के संतों और सनातन धर्म को बदनाम किया गया।” उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संसद में दिए बयान को दोहराते हुए कहा कि “हिंदू कभी आतंकी नहीं हो सकता, क्योंकि उसका मूल स्वभाव शांति और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में निहित है।”
क्या था 2008 मालेगांव विस्फोट मामला?
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक बाइक में लगे विस्फोटक से धमाका हुआ था, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल हुए थे। इस मामले की जांच में सेना के अधिकारी और कुछ कथित हिंदू संगठनों से जुड़े नाम सामने आए थे।
2009 में पहली चार्जशीट दाखिल हुई थी, जिसमें 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था। जांच एजेंसियों ने दावा किया था कि यह हमला संगठित साजिश का हिस्सा था और बम बनाने में आरडीएक्स का इस्तेमाल हुआ था।
17 साल की लंबी जांच और सुनवाई के बाद अब अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत के इस फैसले को कानून और संविधान में भरोसे की जीत बताया जा रहा है|